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अधूरी और पूरी अच्छाई

अच्छाई पर जो समाज करता विश्वास आधार है
की आगे बढ़ हो रहा सफल ये निर्बोध संसार है

नेकी का जग पे प्रभाव दिखता सम्पूर्ण उत्थान में
मेधावी जन नेक को ह्रदय से दें प्यार सम्मान में

लोगों का मन है अदोष नियमी निर्लेप आचार हो
अच्छे कर्म करें सभी स्थिति भले हों श्रेष्ठ संस्कार हो

है ये सोच भली परन्तु इसके अभ्यास में कष्ट है
जैसे जीवन हो व्यतीत समझे नेकी नहीं स्पष्ट है

जो हों लोग विचारशील व भले वे स्नेह से पूर हों
पूरी हो करुणा समग्र विपदा पीड़ा तभी दूर हो

जो ना केवल बुद्धि से खुश रहें संपूर्ण विद्वान हों
तो जा के जन के विवाद भय का पूरा समाधान हो

हो सोची-समझी दया अनुभवी स्थायी भलाई तभी
पाये प्रज्ञ प्रजा प्रगाढ़ सुख हो के वे मनीषी सभी

नेकी शौर्य व प्रज्ञता सब जुड़ें तो वे प्रभावी बने
ना कोई दुख कष्ट या डर रहे संसार के सामने

चारों ओर उड़े सचेत व भली संकल्पना की ध्वजा
छोटे प्रश्न विशाल संकट सभी पे जीत पाये प्रजा

- कालपाठी



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