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समयदीप

- कालपाठी की कविताएं

भूमिका

इन कविताओं में आप सभी भारतीय काव्य सिद्धांतों, रस, रीति, ध्वनि, अलंकार, वक्रोक्ति और औचित्य को थोड़ा बहुत देख पाएंगे। फिर भी मेरा मूल प्रयास ध्वनि सिद्धांत से सब से अधिक प्रेरित रहता है। उसमें विशेष कर, अभिधा शब्द शक्ति, अभिधामूल शाब्दी व्यंजना और आर्थी व्यंजना की ध्वनि कविता में हो ऐसा मेरा प्रयास रहता है। दीर्घ काल के दृष्टिकोण से अलग अलग पाठक के लिए अलग अलग भाव उत्प्रेरित होंगे यह मेरी आशा है।

मुझे वर्णिक वृत्त कविता शैली ने मोहित, प्रभावित और प्रेरित किया है। आरंभ की कुछ मात्रिक कविताओं के बाद अब में वर्णिक वृत्त चरण वाली कविताएं ही लिखता हूँ।

मेरे विचारों का झुकाव आदर्शवाद की ओर है और इसके बारे में मैंने एक छंद लिखा है:

काल-चक्र और हम

आज विश्व मुट्ठी में थामे, है जमा हुआ यथार्थवाद
काल-चक्र के चलते चलते, फिर बढ़ेगा आदर्शवाद

कैसा होगा आदर्शवाद, सब मानेंगे क्या आदर्श
सहृदयता सहित इस पर लोग, कर सकेंगे विचार विमर्श

                                                                - कालपाठी

कविता लिखने का सन्दर्भ

अपने कुछ विचारों को व्यक्त करने के साधन के रूप में, दशकों की सोच के बाद, मैंने कविता लिखना शुरू किया है। एक महत्वपूर्ण लक्ष्य भारतीय संस्कृति पर आधारित विचारों को अंतरराष्ट्रीय पाठकों एवं प्रेक्षकों तक लाना है। एक ऐसे विनम्र प्रयास से लाना है, जो मैं व्यक्तिगत रूप से कर सकता हूं। मेरा मानना ​​है कि अनौपचारिक रूप से स्वीकृत, अंतरराष्ट्रीय संस्कृति एक नवीनीकरण चाहती है और भारतीय संस्कृति के पास देने के लिए बहुत कुछ है।

जैसा कि वसुधैव कुटुम्बकम और सर्वधर्म समभाव में परिलक्षित होता है, भारतीय संस्कृति का हमेशा एक वैश्विक दृष्टिकोण रहा है। मेरी कविताओं का उद्देश्य वैश्विक पाठकों एवं प्रेक्षकों के लिए भारतीय विचारों के अधिक उदाहरण उपलब्ध कराना है। हालांकि भारतीय संस्कृति की कुछ समय से अंतरराष्ट्रीय पहुंच रही है, लेकिन यह अधिकतर विशिष्ट क्षेत्रों तक सीमित रही है। मेरा प्रयास है कि ऐसे क्षेत्रों का विस्तार किया जाए और उन्हें अंतर्राष्ट्रीय सोच की मुख्य धारा में सम्मिलित किया जाए। भारतीय संस्कृति जीवन के अनेक भावों में झलकती है और मेरा ध्यान उनमे से कुछ भावों तक सीमित है।

मेरी विचार विधि किसी विषय को गहराई से समझने के लिए लम्बी समय अवधि का उपयोग करती है। यही कारण है मैंने "कालपाठी" उपनाम रखा है।

वर्णिक वृत्त कविताएं

वर्णिक वृत्त कविता की रमणीयता व माधुर्य उसके वर्णिक छंद के चरण के प्रतिरूप में भी पाए जाते हैं। मेरी वर्णिक वृत्त चरण वाली कविताओं के वर्णिक छंद के गणों के प्रतिरूप, भारत के प्राचीन काल के कवियों ने संस्कृत भाषा के काव्य के लिए रचे हैं। वर्णिक वृत्त चरण वाली कविताएं गायी जा सकती हैं।

आभार

मैं भारत तथा विश्व की संस्कृति और अतीत एवं वर्तमान के अनगिनत व्यक्तियों और प्राणियों का आभारी हूँ। उनसे मैने श्रेष्ठ गुण बटोर कर अपना व्यक्तित्व बनाने का प्रयास किया है। मुझे प्राकृतिक भव्यता से भी बहुत प्रेरणा मिली है।

कवि प्रदीपजी का लिखा गाना "चल अकेला" मेरे लिए जीवन भर एक शक्ति का स्रोत रहा है। गाने को मुकेश ने गाया है और संगीत ओ पी नैयर ने दिया है।

मैं अपनी कविताओं को इस आशा के साथ प्रस्तुत करता हूं की मुझे जो विश्व से मिला है उसका एक छोटा सा अंश विश्व को लौटा सकूँ।

मेरे बारे में

मेरा नाम धीरेन्द्र दत्त त्रिपाठी है। मेरा जन्म विदिशा, मधय प्रदेश का है। मैं विदिशा, भोपाल, मुंबई और कानपुर में रहा हूँ। अब मैं अहमदाबाद में रहता हूँ।

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