क्यूँ लगता है अच्छाई नहीं फैलती ?
दिन दिवस भलाई फैलती जा रही है
फिर जन जन क्यूँ ना भानते आ रही है
हर दिन जग लाखों को बनाता सुखी है
फिर मृदु मन होता क्यूँ जनों का दुखी है
सतत सब भला हो सोच ये है मनों में
मगर कठिन है क्यूँ सोच ये है जनों में
जन हिल मिल पाएं ये लगे सत्य क्यूँ ना
सहज जन सुखी हों ये लगे शक्य क्यूँ ना
जिधर किधर छाई है भलाई जहाँ से
विनय विफल है ये सोच आई कहाँ से
जगत हर भले को दे नहीं मान सच्चा
न अनगिनत नेकी को मिले ध्यान अच्छा
न जन समझते क्यूँ लक्ष्य ऊँचा भलाई
दृढ़ तप कर होती वीर नेकी समाई
नित उचित करें वो हैं नहीं लोग हारे
बस उन सबके हैं ही मनोभाव न्यारे
अलग पृथक थोड़े क्यूँ गुणी लोग होते
अधिक सदृश होते लोग तो साथ होते
सुजन पृथक ही जो काल ना यों बिताते
सब स्थल स्थिति अच्छे कर्म हो साध्य पाते
सुजन सुजन जैसे साथ नाते गढ़ेंगे
सुजन सुजन वैसे साथ होते बढ़ेंगे
सहज जन सुखी हों ये प्रजा भेंट पाए
जब समरसता ला सुप्त नेकी जगाये
- कालपाठी