मुख पृष्ठ / Home       |       कविताएं / Poems        |        संपर्क / Contact

प्रज्ञता और प्रजा

तन कर चलें बच्चे बोधें नहीं कुछ भी कमी
फिर किस लिए नैनों में आ बसी इतनी नमी

घर सुखद था प्यारे आशा भरे दिन रात थे
हर दिन नया सीखा छोटे बड़े सब साथ थे

चपल मन से सीखे बोली दया चलना सभी
तब फिर कहाँ से आया ये विभाजन है अभी

विरह सहते कक्षा में है लगे दुनिया नई
जग भर दिखे थोड़े बच्चे फलें पिछड़ें कई

घर पर कहीं बोली थी वो न जो पढ़नी पड़ी
इक अटपटी भाषा ने की कमी कर दी खड़ी

कुदरत करे ऐसा माने सभी जब हों दुखी
कुदरत न है टेढ़ी जो वो रखे कुछ ही सुखी

न क्षम न बली ऐसा देखें न बाघ न केसरी
पर दिख सके ढीली कक्षा अरोचकता भरी

न गुमसुम हों पूरी चेष्टा प्रशिक्षक भी करे
झुरमुट बने छोटे बच्चे परन्तु नहीं हरे

बल उन सभी में है भोले भले मन में ढका
वह बल कभी बच्चा जल्दी न ठीक दिखा सका

अलग उसकी वो शैली में बसा बल है बड़ा
इस विविधता के जादू से हुआ जग है खड़ा

पर विविधता धिक्कारी तो बुरा तब हो गया
कुछ बिदकते बच्चों का जो मनोबल खो गया

कुछ पढ़ सके ना जल्दी है प्रबंधन जानता
सब विषय ना सीखें पूरा रहे असमानता

समझ सकते ना बच्चे हो रहा यह छांटना
न समझ सकें वो हैं थोड़े बड़े पद बांटना

परम धन श्री है ही शिक्षा व नीव समाज की
जग निपुण हो शिक्षा में है जरूरत आज की

क्षम कुशल हैं सारे बच्चे अनेक प्रमाण हैं
धनुष बदलें तो पायें वे सभी इक बाण हैं

- कालपाठी



साधन / Resources             © kaalpathi.karmyogi.com