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वर्णन: किसने चुराई इन बादलों की बूँदें ?


रचना का काल: जनवरी २०२२

कविता का सार
यह कविता का आग्रह है कि मनुष्य की प्रवृत्ति सोचने की है। आगे आग्रह है कि यह सोच हम वैसे ही अनायास कर पाते हैं जैसे सांस लेना या ह्रदय का धड़कना। और हम अपनी सोच से लाभ पाते हैं। लेकिन देखने में यह भी आता है कि प्राय: मनुष्य सोचने से दूर रहते हैं। वह सोचने के विकल्प से काम चलाते हैं या उन्हें चलाना पड़ता है। इस नैसर्गिक मनुष्य के सोचने की प्रवृत्ति के सम्मान में और उस प्रवृत्ती के मिटने या मिटाय जाने के विरोध में यह कविता रची गयी है। यह कविता के चरण वर्णिक वृत्त एवं तुकांत हैं।

वर्णिक छंद: वसंततिलका
इसके प्रत्येक चरण में १४ वर्ण होते हैं। वर्णो के क्रम में तगण ( ऽऽ।), भगण (ऽ।।), दो जगण (। ऽ।, । ऽ।) तथा दो गुरु ( ऽऽ) रहते हैं।
मात्रा: २१।
वर्ण प्रतिरूप यहाँ देख सकते हैं।
वर्ण प्रतिरूप दिखाने की सॉफ्टवेयर के लिए गीत गतिरूप को धन्यवाद।

Here is a list of select words with the intended meaning in the poem. Some words may have meanings in addition to those mentioned here:

नवीन - novel, fresh
छाप - impression
प्रयोज्य - requisite, useful, usable
मेधा - judgment, intelligence
झुकाये - bowed, subjugated
दृढ़ - strong, powerful
घोर - deep, intense

Time of composition: January 2022

Essence of poem "Who stole the raindrops from these clouds?"
The poem affirms that the tendency of humankind is to think. It further affirms that we are able to do this thinking spontaneously in the same way as we breathe or our heart beats. And we benefit from the thinking. But it is also seen that people often make do, or are made to do, without thinking. They make do, or are made to do, with thinking done for them. This poem has been composed as a mark of respect to our tendency to think and to oppose the loss of this tendency to think, by choice or by force.



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