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वर्णन: नैतिकता और काल


रचना का काल: नवंबर २०२१

कविता का सार
यह कविता सत्यमेव जयते की एक व्याख्या है। समाज और प्रथा का गहरा संबंध है और हर युग में नयी नयी प्रथा स्थापित होती हैं। लेकिन कई प्रथाएं मिट जाती हैं। बहुधा इस लिए कि वह नैतिकता की परीक्षा में विफल हो जाती हैं। केवल नैतिक प्रथायें ही सदा स्थापित रह सकती हैं। यह कविता के चरण वर्णिक वृत्त एवं तुकांत हैं।

वर्णिक छंद: शिखरिणी
इसमें यगण (।ऽऽ), मगण (ऽऽऽ), नगण (।।।), सगण (।।ऽ), भगण ( ऽ।।), लघु (।), गुरु (ऽ) मिलाकर १७ वर्ण होते हैं। छह वर्णों पर यति।
मात्रा: २५।

Here is a list of select words with the intended meaning in the poem. Some words may have meanings in addition to those mentioned here:

मनन - contemplation
सांचो - mould
यथा - thus, in the manner which
अटल - unyielding, firm
अचल - immovable
श्रद्धा - devotion, faith
धारा - section/clause of law
विधि - method
निष्कपट - sincere, guileless
शोभा - grace, beauty
घन - intense
सुकृत - well done, with moral merit
साम्यिक - equitable, impartial
नैतिक - ethical, moral

Time of composition: November 2021

Essence of poem "Ethics and time"
This poem is an interpretation of 'Satyamev Jayate' (Truth Shall Prevail). There is a deep relationship between society and custom and new customs are established in every era. But many practices fade away. Often because they fail the test of ethics. Only ethical practices can survive forever.



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