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फूल तू जो खिला है आज...

फूल तू जो खिला है आज निसर्गत: वन में
पुष्प तू उत्प्रेरक मैं मगन हुआ मनन में

आकृति हर्षित है तेरी व सौम्यता लालित
पर बस इनसे नहीं मन मेरा है प्रभावित

सम्मिलित है इस रूप भव्य और तेजस्वी
में इक अभिलाषा सारपूर्ण और यशस्वी

उस अभिलाषा का स्रोत है उद्देश्य महान
सदा तेरे वंशजों का रहना विद्यमान

संपूर्ण जीवन में न कोई कुकर्म तेरा
महात्मा रूप मूल कल्याण धर्म तेरा

प्रेरणा बल वह पौधा जिसका तू अंश है
वह जीव साम्राज्य जिसमें तेरा वंश है

अतिसूक्ष्म ऋण से रची रचना तेरी प्यारी
पौधा चुकाय ऋण लुब्ध मानवों का भारी

ना कठोर निर्दयी ना ही कभी अभिमानी
मानवता प्रति है तेरा वर्ग नित्य दानी

वनस्पति पालते पशु यही है वास्तविकता
समायी है तुझमें सच्ची सरल नैतिकता

हो यह अच्छाई से प्रज्ञ जीव नित प्रेरित
निहारते निसर्ग जब वह हो जाएँ मोहित

- कालपाठी



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